यौवन ने ली है अंगड़ाई
जन्मदिवस की बेला आई |
विकट विशेष विस्मय भरमाई
स्वप्निल स्वप्निल किस्मत पायी
कर्म की देहरी , कर्म ही पूजा
निजता रखो कोई नहीं दूजा |
निशा है बाकी , समर शेष है,
ओढ़े लबादा गरिमामयी वेश है|
यही है दुनिया , यहीं है जीना
रखना कभी न तुम उम्र की सीमा
प्रेम निरंतर , कटुता न सहाई
जीवन संकल्प की यही दुहाई|
कासे कहूँ ओ मितवा मेरे ,
जनम -दिवस ने याद दिलाई
कि सचमुच ,
यौवन ने ले ली है अंगड़ाई|||

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