ये रिश्तों की बातें करती दुनिया
इन रिश्तों पे हर पल मरती दुनिया
कौन है अपना ,कौन पराया
कौन किसी को कितना भाया
मोल करे हर बंधन का ये
भाव लगाए हर क्षण क्षण का ये
जीवन को जो हर पल कुचले
उन रिश्तों से क्यों ये डरती दुनिया?
ये रिश्तों की बातें करती दुनिया
इन रिश्तों पे हर पल मरती दुनिया ||
कल सड़क पे जो लोग खड़े थे
वे भी तो लगे आत्मीय बड़े थे ,
फिर क्यूँकर दिल नहीं माना अपना
लगा छल छद्म छलावा या फिर कोई सपना था|
वे भी तो हम जैसे माणूस ही थे
होंठो पे खिलकती मुस्कान कितने खुश से थे
उनसे अपना एक अनूठा रिश्ता जोड़ आया मै
उनकी प्रफुल्लित उर्जा का प्रवाह मोड़ आया मै
फिर भी खुश नहीं हैं मेरे अपने लोग
लगा उन्हें ये मेरा कोई मानसिक रोग
होकर भी अपने जो रह जाते अनजाने
उन रिश्तों से क्यों न लडती दुनिया
ये रिश्तों की बातें करती दुनिया
इन रिश्तों पे हर पल मरती दुनिया||
मम्मी पापा ,ताया ताई , भाई औ भतीजा
कसर रही दीदी जी की, फिर आये अपने जीजा
दोस्तों का भी न मन माना तो
वे भी इस करतल हंसी में शरीक हुए
हम होने लगे,बेगाने, सोचा
क्यूँ रिश्ते इतने बारीक हुए
फिर पहुंचा उसी जगह पे
कुछ नए चेहरों का दीदार हुआ
मानव जाति का धर्मं निभा कर
उस चौराहे के मै पार हुआ
सड़क पे चलती बुढ़िया को देखा
दादी अम्मा का अहसास हुआ
कॉलेज की प्रोफेसर में कभी
अपनी माँ का भास हुआ|
इतनेपर भी,
क्यूँ सिमटे सिकुड़े जग में खुद को
सीमित रिश्तों में समटती दुनिया
जीवनरस खिलने न दे जो
उन रिश्तों का क्यूँ कुछ न करती दुनिया
ये रिश्तों की बातें करती दुनिया
इन रिश्तों पे हर पल मरती दुनिया||
इन रिश्तों पे हर पल मरती दुनिया
कौन है अपना ,कौन पराया
कौन किसी को कितना भाया
मोल करे हर बंधन का ये
भाव लगाए हर क्षण क्षण का ये
जीवन को जो हर पल कुचले
उन रिश्तों से क्यों ये डरती दुनिया?
ये रिश्तों की बातें करती दुनिया
इन रिश्तों पे हर पल मरती दुनिया ||
कल सड़क पे जो लोग खड़े थे
वे भी तो लगे आत्मीय बड़े थे ,
फिर क्यूँकर दिल नहीं माना अपना
लगा छल छद्म छलावा या फिर कोई सपना था|
वे भी तो हम जैसे माणूस ही थे
होंठो पे खिलकती मुस्कान कितने खुश से थे
उनसे अपना एक अनूठा रिश्ता जोड़ आया मै
उनकी प्रफुल्लित उर्जा का प्रवाह मोड़ आया मै
फिर भी खुश नहीं हैं मेरे अपने लोग
लगा उन्हें ये मेरा कोई मानसिक रोग
होकर भी अपने जो रह जाते अनजाने
उन रिश्तों से क्यों न लडती दुनिया
ये रिश्तों की बातें करती दुनिया
इन रिश्तों पे हर पल मरती दुनिया||
मम्मी पापा ,ताया ताई , भाई औ भतीजा
कसर रही दीदी जी की, फिर आये अपने जीजा
दोस्तों का भी न मन माना तो
वे भी इस करतल हंसी में शरीक हुए
हम होने लगे,बेगाने, सोचा
क्यूँ रिश्ते इतने बारीक हुए
फिर पहुंचा उसी जगह पे
कुछ नए चेहरों का दीदार हुआ
मानव जाति का धर्मं निभा कर
उस चौराहे के मै पार हुआ
सड़क पे चलती बुढ़िया को देखा
दादी अम्मा का अहसास हुआ
कॉलेज की प्रोफेसर में कभी
अपनी माँ का भास हुआ|
इतनेपर भी,
क्यूँ सिमटे सिकुड़े जग में खुद को
सीमित रिश्तों में समटती दुनिया
जीवनरस खिलने न दे जो
उन रिश्तों का क्यूँ कुछ न करती दुनिया
ये रिश्तों की बातें करती दुनिया
इन रिश्तों पे हर पल मरती दुनिया||
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