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Tuesday, 30 August 2011



तेरा-मेरा नाता

अश्क़ गिरे तेरी आँखों से 
   मेरा रोम रोम    तब  रोता है 

नैना बोझिल हों जब तेरे 
 मेरा दिल  फिर तन्हा  होता   है
 जागे तू कभी  रात  रात भर
  मेरा सुकून कहीं खोता है
 दोस्ती- प्यार  या  जीवन  सार 
 रिश्तों का है ये कैसा व्यापार ?
  
क्यूँ बिन जाने , क्यूँ  बिन समझें 
 बंदा पाप जनम के धोता है 
अश्क़ गिरे तेरी आँखों से 
   मेरा रोम रोम    तब  रोता है ..

आई हो तुम एक परी सी 
  मेरे दर्द  की एक जड़ी सी
   मदमाते फूलों की एक लड़ी सी
    या फिर उम्मीदों की ढेर बड़ी सी

 कुछ तो है, कुछ भी तो  है
  कुछ मेरे अन्दर क्यूँ येहोता है

अश्क़ गिरे तेरी आँखों से 
   मेरा रोम रोम    तब  रोता है ....
  

Sunday, 21 August 2011

बर्बाद -ऐ -मोहब्बत

गर  डूबे जिंदगी  मोहब्बत  की लहरों में 
 ये सहना भी  तो कभी  आसां नहीं होता
मोहब्बत  की  राह में खाएं हैं इतने धोके 
   ये  हाल - ए - मोहब्बत भी अब बयां नहीं होता
ज़ज्ब  हुए हैं वो किये गए  वादे इरादे  
    ज़ज्ब हुए हैं वो सपने वो प्यारी यादे
भूले हैं उन हसीं जुल्फों को  यारों
    जिनके बने  थे कभी हम तो प्यादे 
इश्क है धोका , इश्क  है छलावा
   केवल  इश्क की बाँहों में जहाँ  नहीं  होता

मोहब्बत  की  राह में खाएं हैं इतने धोके 
  ये  हाल - ए - मोहब्बत भी अब बयां नहीं होता||

Friday, 19 August 2011

"रिश्तों की बातें करती दुनिया"

ये  रिश्तों  की  बातें  करती  दुनिया  
                        इन रिश्तों  पे  हर  पल मरती  दुनिया
कौन है  अपना ,कौन  पराया  
                        कौन  किसी  को  कितना  भाया
मोल  करे  हर  बंधन  का  ये
                         भाव  लगाए  हर  क्षण क्षण का  ये
जीवन  को  जो  हर पल  कुचले  
                        उन रिश्तों  से क्यों  ये  डरती  दुनिया? 

ये  रिश्तों  की  बातें  करती  दुनिया  
                        इन रिश्तों  पे  हर  पल मरती  दुनिया ||


                                                   कल सड़क  पे जो  लोग  खड़े  थे  
                                                   वे भी  तो  लगे  आत्मीय  बड़े थे ,
                                              फिर क्यूँकर  दिल नहीं माना अपना
                                            लगा  छल छद्म छलावा या फिर  कोई सपना  था|
वे  भी तो  हम जैसे माणूस  ही थे
होंठो पे खिलकती मुस्कान कितने खुश से थे
उनसे अपना एक अनूठा  रिश्ता  जोड़ आया मै
उनकी प्रफुल्लित उर्जा का प्रवाह मोड़  आया मै 
                                              फिर भी खुश नहीं हैं  मेरे अपने  लोग
                                               लगा उन्हें  ये मेरा कोई  मानसिक  रोग 
होकर भी  अपने  जो  रह  जाते  अनजाने  
                                  उन  रिश्तों  से क्यों न लडती दुनिया
ये  रिश्तों  की  बातें  करती  दुनिया  
                        इन रिश्तों  पे  हर  पल मरती  दुनिया|| 


मम्मी पापा ,ताया ताई , भाई औ  भतीजा  
कसर रही दीदी जी की, फिर आये अपने जीजा 
दोस्तों का भी न मन माना तो
वे भी  इस करतल हंसी में शरीक हुए
                            
                            हम  होने लगे,बेगाने, सोचा 
                            क्यूँ रिश्ते इतने बारीक हुए 

फिर पहुंचा उसी जगह पे
कुछ नए चेहरों  का दीदार  हुआ 
मानव जाति का  धर्मं निभा कर 
उस चौराहे के  मै पार हुआ
                              
                               सड़क  पे चलती बुढ़िया को देखा 
                               दादी अम्मा का अहसास  हुआ 
                                कॉलेज की  प्रोफेसर में कभी 
                                 अपनी माँ का  भास हुआ|

इतनेपर  भी,


क्यूँ सिमटे सिकुड़े जग में   खुद  को 
सीमित रिश्तों में समटती  दुनिया  
जीवनरस  खिलने न   दे  जो 
 उन रिश्तों  का  क्यूँ कुछ  न  करती  दुनिया


ये  रिश्तों  की  बातें  करती  दुनिया  
                        इन रिश्तों  पे  हर  पल मरती  दुनिया||







Thursday, 18 August 2011

जनम -दिवस ने याद दिलाई......







                                          यौवन ने ली है अंगड़ाई 
                                                              जन्मदिवस की बेला आई |
                                           विकट विशेष विस्मय भरमाई
                                                                स्वप्निल  स्वप्निल किस्मत पायी  
                                           कर्म की देहरी , कर्म ही  पूजा  
                                                                 निजता  रखो  कोई नहीं दूजा | 
                                           निशा है  बाकी  , समर शेष है,
                                                                  ओढ़े  लबादा  गरिमामयी वेश  है|
                                            यही है दुनिया , यहीं  है जीना 
                                                                   रखना कभी न तुम  उम्र की सीमा 
                                           प्रेम निरंतर  , कटुता न सहाई
                                                                   जीवन  संकल्प  की यही  दुहाई| 
                                           कासे कहूँ  ओ  मितवा मेरे ,
                                                                   जनम -दिवस ने याद  दिलाई 

                                           कि  सचमुच ,
                                                                  यौवन ने ले  ली है  अंगड़ाई|||

क्यूँ न आये इस देश में,भैया अपना जन लोकपाल|

हाय !
भ्रष्टों ने कर दिया है देश का बुरा हाल
गरीब हुए है परेशान, जनता है क़र्ज़ से बेहाल
सरकार खजाने लूट रही, देश हो रहा है कंगाल
ऐसे में देश व् देशवासियों से मेरा बस एक सवाल
क्यूँ न आये इस देश में , भैया अपना जन लोकपाल !

रिश्वतखोर बेझिझक रिश्वत खा रहे
अधिकारीगन बस जनता को डरा रहे
बिना काम की कमाई वे मुफ्त में पा रहे
देश की दौलत घोटालो में लुटाये जा रहे
आफत में जब पड़ी हो, गरीबों की रोटी दाल
ऐसे में देश व् देशवासियों से मेरा बस एक सवाल
क्यूँ न आये इस देश में , भैया अपना जन लोकपाल !


सेवा भावना, कर्त्तव्य भावना, सब कुछ इन्होने छोड़ दिया
अपनी सारी निष्ठा को बस पैसे की ओर है मोड़ दिया
कौन बनाये ज्यादा पैसे, इसका है बस होड़ किया
भोली जनता की उम्मीदों को है, इन्होने तोड़ दिया
बढ़ने लगा हो जब भ्रष्टाचारियों का जंजाल
ऐसे में देश व् देशवासियों से मेरा बस एक सवाल
क्यूँ न आये इस देश में , भैया अपना जन लोकपाल !


जिनके भरोसे जनता बैठी, वो दिल्ली भी बहरी है
भैया! अपने पाँव समेटे, इनकी चाल बड़ी गहरी है
पेश किया इन्होने ने भी है अपना एक सरकारी लोकपाल
नियति मंशा साफ़ नहीं है, किया है बस केवल झोलझाल
दायरा बना कर किया है, जो इन्होने बड़ा बवाल
ऐसे में देश व् देशवासियों से मेरा बस एक सवाल
क्यूँ न आये इस देश में , भैया अपना जन लोकपाल !

पी. ऍम. जी रहेंगे बाहर, जज साहब की भी मस्ती है
सांसद महोदय की बात न कर, उनकी भी अपनी हस्ती है
इस भेंड-चाल के खेल में यारो, डूब रही देश की कश्ती है
हम गरीबों की क्या पूछ, जान भी ले लो, सस्ती है 
बरसे दुखवा चहुँओर, जब अपने नेतागण ही लुटे माल 
ऐसे में देश व् देशवासियों से मेरा बस एक सवाल
क्यूँ न आये इस देश में , भैया अपना जन लोकपाल !

लहर उठी है देश में, अन्ना हजारे के वेश में
गर न संभले न जुटे हम, इस कष्ट क्लान्ति क्लेश में
मौका छूटा तो फिर फसेंगे, किसी करप्शन में, किसी केस में 
देश रुकेगा, देश पिछड़गा, स्वप्निल विकास की रेस में
बढ़ने लगेगा फिर से भ्रष्टाचार साल दर साल

ऐसे में याद करो देशवासियों, अपना वो इक सवाल
लाना है देश में, अपना साफ़ सुथरा जन लोकपाल

गर करना है सरे देश को करप्शन मुक्त
लाइए फिर हर राज्य में एक लोकायुक्त
सिटिजन चार्टर में समय सीमा सख्ती से अपनाइए
भ्रष्ट कर्मचारियों को आप नौकरी से भगाइए
स्वछ सुंदर पावन समाज की परिकल्पना
जब लेने लगी हो हिलोरें मार कर उछाल 
ऐसे में मेरे देशवासियों,
लाना ही होगा अपना साफ़ सुथरा जन लोकपाल !!

दिल की कसक बढ़ाये जो...........

बीत गया वो चुहलबाजियों का दौर 
                    उनकी हर अदा अब उनका सरमाया है |
 जुल्फों की आड़ लिए उनकी वो मुस्कान  
                     उनका  हर रूप रंग मन को भाया  है|
बलखाते लट, मदमाता यौवन  
                      उफ़ ! कैसी उनकी  ये  अनुपम  काया  है| 
 खींचे जो मन को बार बार  
                       उस अप्रितम हुस्न का  ये साया  है| 

उनकी हर एक  बातों पर  करी  हमने  बड़ी  तिजारत  है
दिल की कसक  बढ़ाये  जो, हाय! कैसी मेरी  मोहब्बत  है|| 

पल-पल हरपल  खोजे  मनवा 
                          बस  उनसे  ही  बातें करने  को
कहे  जिन्हें सब  सपनीले  होंठ  
                          उन होंठो  पे  ही मरने  को 
हरक्षण  पुलकित  हरदम  पुलकित
                           तैयार  है दिल उन्हें  हरने  को 
समय  बचा है सीमित  अपना  
                           कुछ  सपने  हैं  बस सँवरने को 

फिर  वो मेरी, मैं  हूँ  उसका , मुझे  उसकी  ही जरुरत  है,  
दिल की कसक बढ़ाये जो,हाय!कैसी मेरी मोहब्बत है ||

यूँ न हँसो हमपे यारो , ये अपना ही अफसाना है

दर्द भरी दुनिया है, काफी बेदर्द जमाना है
यूँ न हँसो हमपे यारों, ये अपना ही अफसाना है|

उन छोटी-२ गलियो में, उन छोटे-२  घरो में
संस्कार और विचार पैबस्त थे, हमारी भावनाओ में, हमारी जड़ो  मे
उस एक दो की गिनती में, वो गुरूजी के ककहरो में
मजा तो  बस आता था , उन  छोटे-२ शहरों मे

छूटा वो  अपना  घर , रहा न कोई ठौर ठिकाना है
यूँ  न  हँसो  हमपे  यारो , ये  अपना  ही  अफसाना  है ||

वो  दोस्तों  की  हैल्लो  हाय , वो  ताऊ  जी  का  राम  राम 
कैसे भुलाये  हम  अपनी  बितायी  हर  एक  वो शाम 
वो  पल  पल  झगड़ना  , फिर  ढूँढना  हर  दोस्त  का  नया  नाम
अनमोल  हैं  जो  पल , जो यादें , कैसे  लगायें  उनके  दाम

घुटने  लगा  है  जीवन,  बना  अपना ही  अस्तित्व निशाना  है
तब यूँ  न  हँसो  हमपे  यारो , ये  अपना  ही  अफसाना  है ||

चार  पलों की  मस्ती थी , अब  चार जुगो  की  बात है 
जिंदगानी  के मोड़  अनूठे , इसकी  अजब  गजब  सौगात  है
खुशियाँ है  क्षणभंगुर , दुखों  की  यहाँ  बरसात  है
बनते भाव  कभी  कभी , सिर्फ  टूटते  जज्बात  हैं

आ गए  उस मोड़  पे, जहाँ  दर्द  का  काम  ही  रुलाना  है
फिर  यूँ  न  हँसो  हमपे  यारो , ये  अपना  ही  अफसाना  है ||

दिन हो  रहे बोझिल,  रातें  भी भारी हैं
चल  रहा  है अंतर्द्वंद ,खुद की  लड़ाई  जारी  है
धुंधली  पड़ी  है  मंजिल, घिसट  रही  जीवन गाड़ी  है
फिर भी  अपने  ही पीछे , क्यों  पड़ी  दुनिया  सारी  है

कहने  लगे  हैं  लोग-  ये  पागल  है,  ये  दीवाना  है
अब तो,
यूँ  न  हँसो  हमपे  यारो , ये  अपना  ही  अफसाना  है ||

I can't always be right/wrong...

sometimes heart allows to express
sometimes i have to lead the race
sometimes grief speaks through the face
sometimes i have to be in solace
           Be it day or be it night,
           I know, i can,t always be right. 
sometimes life teaches a lot
sometimes feelings are directly shot
sometimes memory comes when i had forgot
sometimes my problem keep tied the knots
          Be it day or be it night
          I know, i can't always be right
sometimes i have too many excuse
sometimes  i suffer so much abuse 
sometimes my pain be of no use
or sometimes other's importance may be huge
         But be it day or be it night 
         I know, i can't always be right
sometimes there may be social corruption
sometimes there may be fully rejection
sometimes my nerve are out of function 
sometimes i may cause other's destruction
         But be it day or be it night
         I know, i can't always be right
sometimes dark dwindles with inner light
sometimes facts are out of sight
whatever it is, day or may be night
I have to see it,i have to fight

Then,
There will be one fine morning
After fighting so long
I will be happy
I will love to sing the song
" Be it day or be the night prolong,
  I know, i can't always be wrong."